मेरे प्यारे दोस्तों, आदरणीय बुज़ुर्गो, प्रशंसको, आलोचकों, आपका प्रेमपूर्ण स्नेह और मार्गदर्शन मुझे हमेशा मिलता रहा है| कभी आपने मुझे शाबाशी दी, कभी आपने उत्साहित किया और कभी आपने मेरी गलतियों को नजरअंदाज भी किया| ..... इस बार इतनी सारी भूमिकाये बनाने का कारण सिर्फ इतना है कि इस बार कलम चलना तो बहुत चाहती है लेकिन उसे रास्ता नही मिल रहा| मैं दुविधा में हूँ क्योंकि मेरे मन में एक सवाल है कि क्या मुझे अपनी लेखनी पर ना चाहते हुए भी अंकुश रखकर अपने विचारो को स्वयं से समझौता करके किसी और की ख्वाहिश के मुताबिक़ लिखना चाहिए या मेरे द्वारा लिखे गए विचार सिर्फ वही हो, जो जैसा सोच रहा है? कुछ लिखकर मुझे आत्मसंतुष्टि मिलती है लेकिन स्वयं की आत्मसंतुष्टि के लिए किसी के मन को आहत करना ठीक होगा? लेकिन कलम का अपना एक धर्म होता है, जो उसे हर हाल में निभाना ही चाहिए| धर्म यानि मानव जीवन में संस्कारों का सिंचन कर इस भव में सफल और मृत्यु के बाद भव पार उतारकर मोक्ष ले जाये| ऐसा ही ‘अहिंसा परमो धर्म’ के मूलमंत्र को मानता हमारा छोटा-सा लेकिन साधन-संपन्न समृद्ध जैन समाज सदैव से सभी के लिए वन्दनीय रहा है| विश्व पटल पर अब तक जैन धर्म ने अपनी विजयपताका को उच्च स्तर पर सुशोभित बनाये रखा किन्तु इसे नियति का खेल या समय की विडम्बना कहेंगे कि बदलते परिवेश और आधुनिकता की अंधी दौड़ में जैन धर्म का अनेक मत-पंथ और विभिन्न समुदायों का अपनी-अपनी सुविधानुसार गठन होने लगा और यह कहते हुए हृदय छलनी भी होता है कि स्वयं के पंथ को उच्च बताने के लिए एक-दुसरे के समुदाय का विरोध व अपमानित करने में भी कोई कम नही रहता| इस बात को कहने के लिए मेरे पास तीन विशेष कारण हैं, पहला प.पु. आचार्यश्री विमलसागरजी म.सा. का संदेश, जिसमें उन्होंने बताया कि जैन धर्म की स्थानकवासी परंपरा के ज्ञान गच्छ (खींचण) संप्रदाय के अमृतमुनिजी म.सा. मूर्तिपूजक जैन उपाश्रय में रुककर धर्मचर्चा के नाम पर श्रावकों को जिनालय ना जाने और पूजन ना करने के लिए प्रेरित करते हैं और यथासंभव प्रतिज्ञायें भी देते हैं| और तो और वीतरागी प्रभु के प्रक्षाल से मल-मूत्र भी साफ़ कराते हैं| यकीनन यह बेहद निंदनीय और असहनीय है| (यह स्पष्ट करना चाहती हूँ कि इस बारे में मुझे कोई व्यक्तिगत जानकारी नही है किन्तु अपने गुरु की बात पर संदेह करना बिलकुल संभव नही|) दूसरा शाश्वत तीर्थ में सवि जीव करूँ शासनरसि की भावना रखने वाले पूज्य साधु भगवंतो के बीच हाथापाई और मामला पुलिस तक पहुंचना (कारण कुछ भी रहा हो) और तीसरा हाल ही में एक मंदिर के ही ट्रस्टी द्वारा घोटाला करना और मामला दर्ज होने पर पुलिस की गिरफ्तारी...|(मुद्दे तो कई और भी हैं)
ये कुछ ऐसे वाकये हैं, जो सोश्यल मिडिया के माध्यम से लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गये लेकिन इस चर्चा में सभी ने सिर्फ समस्या को देखा, समस्या की जड़ तक कोई नही पहुंचे या शायद पहुंचना ही नही चाहते| आज हर गाँव-शहर, यहाँ तक की गली और बिल्डिंगो में भी धार्मिक संस्था और संगठनों के नाम से कोई न कोई सम्मान समारोह या पद नियुक्ति या कथित भक्ति का तथाकथित भव्य व ऐतिहासिक कार्यक्रम होता ही रहता है| आप सभी मेरे प्रिय भाई मेरी इस बात का बुरा ना मानें कि कई सिर्फ नाम की संस्थाए कार्यक्रमों की आड़ में अपने व्यवसाय की बढ़ोतरी कर रहे हैं। (भाई इसलिए क्योंकि 21वीं सदी में जब महिलाएं गृहस्थ धर्म कर साथ-साथ हर क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रही हैं, वहीँ हमारे जैन समाज की किसी भी संस्था में वर्तमान में भी महिला मंडल के अतिरिक्त बहनों को सक्रीय भूमिका के लिए सम्मिलित नही किया गया है|) यहाँ तक की कई संस्थाओं में यह भी देखा गया है कि कुछ लोग बेहद व्यस्तता या कई वरिष्ठ शारीरिक अस्वस्थता के कारण कोई पदाधिकारी अपना कार्य सुचारू रूप से नही कर पाते लेकिन इसके बाद भी उस संस्था के पद पर वर्षो से विराजमान हैं| समाज के उज्जवल भविष्य के लिए यह चिंताजनक विषय है। अब वक्त आ गया है इस विषय पर विशेष चिन्तन करने का कि संस्था या संगठन में कार्य करने के लिए नियुक्त होने वाले ट्रस्टी और कार्यकर्ता के लिए उनकी उपयोगिता और नियम का मापदंड होना बेहद आवश्यक है ताकि उनके साथ-साथ किसी ट्रस्ट मंडल और सकल संघ के नाम पर सवालिया चिन्ह ना लगे वर्ना बंदर के हाथ में उस्तरा देने से सिवाय पछतावे के कुछ हाथ नही आएगा|
ये कुछ ऐसे वाकये हैं, जो सोश्यल मिडिया के माध्यम से लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गये लेकिन इस चर्चा में सभी ने सिर्फ समस्या को देखा, समस्या की जड़ तक कोई नही पहुंचे या शायद पहुंचना ही नही चाहते| आज हर गाँव-शहर, यहाँ तक की गली और बिल्डिंगो में भी धार्मिक संस्था और संगठनों के नाम से कोई न कोई सम्मान समारोह या पद नियुक्ति या कथित भक्ति का तथाकथित भव्य व ऐतिहासिक कार्यक्रम होता ही रहता है| आप सभी मेरे प्रिय भाई मेरी इस बात का बुरा ना मानें कि कई सिर्फ नाम की संस्थाए कार्यक्रमों की आड़ में अपने व्यवसाय की बढ़ोतरी कर रहे हैं। (भाई इसलिए क्योंकि 21वीं सदी में जब महिलाएं गृहस्थ धर्म कर साथ-साथ हर क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रही हैं, वहीँ हमारे जैन समाज की किसी भी संस्था में वर्तमान में भी महिला मंडल के अतिरिक्त बहनों को सक्रीय भूमिका के लिए सम्मिलित नही किया गया है|) यहाँ तक की कई संस्थाओं में यह भी देखा गया है कि कुछ लोग बेहद व्यस्तता या कई वरिष्ठ शारीरिक अस्वस्थता के कारण कोई पदाधिकारी अपना कार्य सुचारू रूप से नही कर पाते लेकिन इसके बाद भी उस संस्था के पद पर वर्षो से विराजमान हैं| समाज के उज्जवल भविष्य के लिए यह चिंताजनक विषय है। अब वक्त आ गया है इस विषय पर विशेष चिन्तन करने का कि संस्था या संगठन में कार्य करने के लिए नियुक्त होने वाले ट्रस्टी और कार्यकर्ता के लिए उनकी उपयोगिता और नियम का मापदंड होना बेहद आवश्यक है ताकि उनके साथ-साथ किसी ट्रस्ट मंडल और सकल संघ के नाम पर सवालिया चिन्ह ना लगे वर्ना बंदर के हाथ में उस्तरा देने से सिवाय पछतावे के कुछ हाथ नही आएगा|
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