Monday, January 9, 2017

जैन संघो में ट्रस्टी पद के लिए प्रथम कसौटी क्या हो, शील, सदाचारी या साधन संपन्नता?


ट्रस्टी यानि विश्वासु व्यक्ति, जो किसी भी संघ या समूह का मुख्य प्रतिनिधि में से एक होता है। निजी क्षेत्र में तो ट्रस्टी के कार्यप्रणाली पर अन्य अधिकारियो और मेंबर की तीखी नजर होती है क्योकि उन्हें अपने लगाये पैसो पर अधिकाधिक मुनाफे की लालसा होती है किंतु धार्मिक और सामाजिक संघ और संस्थाए, जिनकी स्थापना केवल सेवा-सहाय या धर्म भाव के लिए होती है, उन पर अक्सर धन देने वालों का कोई विशेष अधिपत्य नही होता। यहाँ पर लोग पुण्योपार्जन के लिए धन देते है और उन्हें लगता है कि धन देकर उनका उद्देश्य परिपूर्ण हुआ। उस धन को कौन, कहाँ और किस प्रकार से खर्च कर रहा है, उनमें धन देने वालों की कोई विशेष रूचि नही होती| बस समय-समय पर हिसाब का लेखा-जोखा जनरल मीटिंग में मेम्बरों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, जिसमे अधिकांश मेंबर केवल औपचारिकता निभाते है| बहुत कम लोग गहराई से अवलोकन करते है। धार्मिक रीती और परंपरा अनुसार खर्च करना और संस्था के विशेष् नियमो का पालन करना ट्रस्टियों का अहम् कर्तव्य होता है किंतु वे अपना कर्तव्य तभी निभा पाते है जब उन्हें धर्म का ज्ञान और संघ या संस्था में आस्था हो, निजी स्वार्थ या उद्देश्य का जहाँ कोई स्थान न हो। किन्तु आज की विडम्बना ये है कि ऐसा व्यक्ति मिलना थोड़ा कठिन हो गया है, जो धार्मिक हो, ज्ञानी हो और निष्ठावान भी हो| साथ ही ट्रस्टी पद का कार्यभार संभालने के स्वद्रव और समय देने के लिए सक्षम हो। उस पर अब धर्म से अधिक धन की सक्षमता को ट्रस्टी पद के लिए महत्व दिया जा रहा है, जिसका नतीजा ये है कि आज धार्मिक क्षेत्र जो आडम्बर मोहमाया से परे कर्मबन्धन तोड़ने का स्थान है, वहां पर भी सांसारिक व्यवहार होने लगे है। अध्यात्म से अधिक अर्थ पर ध्यान केंद्रित होना एक चेतावनी है, धर्म और नैतिकता से पतन की। यदि किसी संघ व संस्था में एक भी अयोग्य व्यक्ति किसी पद पर आ जाये तो संचालन में बाधाएं तो आएगी ही और धर्म प्रभावना का क्षय और धन प्रभाव का विकास होगा। जिस नाव में एक छोटा-सा भी सुराग हो, उसका रास्ता कितना लंबा होगा? यानि एक अयोग्य ट्रस्टी पुरे संघ को आडम्बर और स्वार्थ रूपी सुराग से डूबा सकता है। आज हमारे सामने ऐसे कई जिवंत उदहारण है, जहाँ ट्रस्टियों ने संघ और संस्था के लिए अहितकारी निर्णयों को लेकर पद की गरिमा को अपने स्वार्थ के लिए घटाया है, जिससे हमारी भावी पीढ़ी का एक वर्ग इस धर्म क्षेत्र में खर्च करने के विरोध में होता जा रहा है। धर्म से दूरी युवावर्ग के पहले धार्मिक फिर सामाजिक दुरी का कारण बन गयी है क्योकि उनके लिए धर्म वैसा है, जैसे उसके प्रतिनिधि है।
हाल ही में बोरीवली संघ के एक ट्रस्टी को संघ की धरोहर को धोखे से बेचकर उससे निजी धन बनाने का मामला सामने आया है। मेहनत की कमाई से पुण्य कमाने और धर्म बचाने के उद्देश्य से खर्च तो कर दिया, पर आगे क्या? उस धन से सही दिशा में ही कार्य होगा, ये युवा पीढ़ी के लिए कही प्रश्नचिह्न न बन जाये? हमारे जैन संघ के किसी ट्रस्टी की इस मामले में गिरफ्तारी एक अलार्म है, भावी पीढ़ी के धर्मविमुख होने के खतरे का क्योंकि ट्रस्टी धर्म और आदर्श समाज के प्रतिनिधि है| मंदिर और उपाश्रय आने वाले प्रत्येक श्रावक का इन प्रतिनिधियों पर विश्वास होता है| पर जब सही व्यक्ति का सही पद पर हम चुनाव नही करते, उनकी कार्यप्रणाली या गतिविधियों का अवलोकन नही करते, उनके व्यक्तित्व को चारित्र से नही बल्कि चकाचौंध से नापते है, तब अनैतिकता को बढ़ावा मिलता है और आदर्श स्वरूप व्यक्ति हमारा विश्वास तोड़ जाता है। यहाँ पर नुकसान सिर्फ धन का नही गिने, लाखो-करोडो रुपये के नुकसान की भरपाई संपन्न जैन शासन मिनटों में कर सकता है पर भावी पीढ़ी के मन में जो मौन प्रश्न और धर्म के प्रति संदेह पनपता है, उसकी भरपाई कैसे होगी?

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